हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो

Pramod Kumar Saini
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हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो

नमस्कार इस पोस्ट classic poetry in hindi for students में हम आपके लिए लेकर आये है एक काव्य रचना जिसको मेरे द्वारा 2001 में लिखा गया था।  जो उस समय गुजरात के भुज शहर में आयी भूकंप त्रासदी पर थी। पर यह कविता आज के इस कोरोना महामारी के इस विनाशक काल में भी प्रत्येक व्यक्ति के हृदय के भावों को अभिव्यक्त करती है।

 


हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो

बंद कलियों को फिर से खिलना सीखा दो,

हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो।

मुर्झाए इस गुलशन को महका कर,

चाहतों की बंसी बजा दो।

धुन कोई गुनगुना दो,

हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो।

कहाँ गई वो खिलखिलाती मुस्कान,

फिर से इन बीहड़ों में डालो जान।

शाखों को पत्तों से फिर मिला दो,

हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो।

धूमिल सा है ये आसमान क्यों,

बिन मौसम के ये बरसात क्यों।

धूप नई खिला दो,

हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो।

बंद पड़े है मंदिर, मस्ज़िद और गुरुद्वारे,

भ्रस्टाचारियों के हो रहे वारे-न्यारें।

शमशानों की अस्तियाँ भुजा दो,

हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो।

कब रुकेगा ये मौत का हाहाकार,

सहन नहीं होती रोती -बिलखतीं माताओं की चित्कार।

कब्रिस्तानों में कब्र खोदना रुकवा दो,

हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो।

हम नादां दे हुई है भूल हमसे बहुत

मानकर हमें अपना कपूत।

अपनी भूल सुधारने का एक मौका दो,

हमें वो अपनी दुनिया लौटा दो।

आपका अपना कवि

प्रमोद कुमार सैनी

( प्रेम )

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