पिंजरे में बंद इंसान

Pramod Kumar Saini
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Pinjare Main Band Insan

पिंजरे में बंद इंसान

नमस्कार! हम आपके सामने लेकर आये है हमारी नवीन रचना Pinjare Main Band Insan यह काव्य रचना इंसान को आईना दिखाने वाले भावों से भरी है। अपने आप को श्रेष्ठ मानकर दूसरों की उपेक्षा करना गलत है। अगर हम ही श्रेष्ठ होते तो आज हमें यूं मुँह न छिपाना पड़ता। आज हमें हमारे खुद के घरों में कैद न रहना पड़ता। सत्य तो यही है की श्रेष्ठ केवल ईश्वर, अल्लाह है जो सबसे बड़ा निर्माता और विनाशक है।

 पिंजरे में बंद इंसान

 पिंजरे में बंद इंसान

जिसका तन जमीं पर था
जिसके हाथ छूते थे आसमान
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

बुद्धि का जिसके पास पिटारा था
विकास और प्रगति का नभ छूता
जिसका सितारा था
वो छुप-छुप छिपाए अपनी जान
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

जिसको बहुत प्यारी आजादी थी
जिसने पाताल तक बांहे फैला दी थी
खतरे में है सबके प्राण
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

जिसको अपनी शक्ति पर था अभिमान
राहें तके अब उसकी श्मशान
न महफ़िल, न मस्ती
हर तरफ सुनसान
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

जो अपनी मद में चूर था
नैतिकता से जो बहुत दूर था
भूल गया था
क्या गीता और क्या कुरान
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

जिसने नदियों के मुख मोड़ दिए थे
चंद्रमा पे अपने पद-चिह्न छोड़ दिए थे
कँहा गयी वो झूठी शान
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

जिसने पत्थरों को चिर दिया था
पल में सात समंदर पार किया था
उतर गया सब गुमान
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

जिसने जंगलों की करदी थी सफाई
बहुत खूब की मोटी-मोटी कमाई
समझता था जो अपने आप को महान
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

प्रकृति को जो रौंद रहा था
जहर के बीज जो बो रहा था
उसके हर्षोल्लास को
सुनने को तरस रहे है कान
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

जो प्राणियों में श्रेष्ठ था
कपि, मर्कट जिसका ज्येष्ठ था
अब भी वक्त है सम्भल जा
इंसां के भीतर छुपे शैतान
अब पिंजरे में बन्द वो इंसान।

आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

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