आड़ू बूंटो

Pramod Kumar Saini
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Aadu Bunto आड़ू बूंटो

नमस्कार दोस्तों ! आज हम लेकर आये है अपनी रचना Aadu Bunto आड़ू बूंटो। यह रचना हमारी मायड़ भाषा राजस्थानी में लिख रहा हूँ ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसको समझ सके। वर्तमान समय की शासन व्यवस्था और लोगों के रहन-सहन को दिखाती यह काव्य रचना एक सीधा सीधा प्रहार है राजनीति और चाटुकारिता पर।  इस व्यवस्था से सामान्य व्यक्ति का जीना दुर्भर हो गया है। रचना पढ़कर अपने सुझाव जरूर दे।

Aadu Bunto


आड़ू बूंटो

मं समझ नहीं पायो

भोळो हो जको आड़ू बूंटो उगायो

इब मनाऊ घणी खैर

इंया लागै है प्रधान मनै होगी देर।

 

ओ गुवाड़ मांय बिखेर दिया कांटा

भला मिनख सही कैगा

बोयो पेड़ बबूल को तो किंया खास्यो सांटा।

 

मं सोच्यो घणो, पर मेरी मति फिरगी

म्हारे घरा रैयो ठूँठ को ठूँठ

अर पड़ोसया कै घरा काकड़ी किरगी।

 

घर मं गोदम होग्या इरी खातिर

घरारी खोल्या खातिर बणा लियो जद इनै खूंटो

इको की न बिगाड़ सक्यो कोई सूंटो।

 

दिन अर रात राखू इरी रूखाळी

घणो पाणी सींच्यो

टूट न ज्या इरी पाळी;

पण म्हारी किस्मत ही है फुटेड़ी

लोगां कै घरा छप्पन भोग

म्हारे घरा फुटेड़ी थाळी।

 

अबके कोई चोखो पेड़ उगासूं

पैली चार भलां मिनखां सूं बतळा सूं

फेर थाने ओज्यू बतासूं।

 

आपका अपना कवि

प्रमोद कुमार सैनी

(प्रेम)

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