सुहाने दिन पुराने दिन

Pramod Kumar Saini
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सुहाने दिन पुराने दिन

नमस्कार आज की हमारी रचना Suhane Din Purane Din हमें उन दिनों की याद दिलाती है जब लोगों के जीवन में प्रेम और शुकुन था। छल, कपट से लोगों का जीवन कोसों-कोसों दूर था। जितना मिलता था उतने में खुश थे। अपनापन था, तीज-त्योहारों का सुहाना मौसम था।  रिश्ते-नातों की अहमियत थी। 

Suhane Din Purane Din


सुहाने दिन पुराने दिन

वो भी क्या दिन थे
जब दिल में शुकुन था
रिश्तों में विश्वास था
न था कोई अपना पराया
अहसान कभी किसी ने न जताया।

खाते थे सब मिल बांटकर
रखते थे द्वेष को अपनों से छांटकर
सबका अपना अपना सहयोग था
काया थी निरोगी
किसी को कोई न रोग था।

शीतल माँ की लोरी थी
निश्छल गाँव की गोरी थी
हर चाची, ताई में मां की मूरत थी
सच में दुनिया बहुत खूबसूरत थी।

गुणों की खान थी दादी-नानी की कहानियां
याद आती है बहुत वीरों की कुर्बानिया
बच्चे क्या बूढ़े, सबकी वाणी में मिठास थी
पिता के समान था ससुर और मां के समान सास थी।

तन-मन को भाती थी गाँव की मिट्टी
बड़े चाव से पढ़ी जाती थी चिट्ठी
तीज-त्योहारों पर रसीले गीतों की गंगा बहती थी
पत्ता-पत्ता बोलता था, डाली-डाली कुछ कहती थी।

संस्कार झलकता था गली-गली में
प्रेम रस छलकता था कली-कली में
जरूरते थी सीमित, न कोई दिखावा था
ज़ुबान की कीमत थी, न कोई छलावा था।

मेहनत करते और खून-पसीना बहाते
कपूत को सब मिलकर समझाते
कन्या लक्ष्मी का रूप थी
जिंदगी कभी छांव तो कभी धूप थी।

आपका अपना कवि 

प्रमोद कुमार सैनी 

(प्रेम)

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