क्याकि कमाई है?
नमस्कार मेरी रचना Kyaki Kamai Hai वर्तमान कोरोना काल की पीड़ा को उजागर करती है। इस काल में हमने क्या क्या खोया है सबकुछ बंया करती दिल को छू लेने वाली यह काव्य रचना है।

क्याकि कमाई है?
अजी भाईजी मत पुछो:
क्याकि कमाई है?
म्हारो तो जीवड़ो ही जाणें
की किंया घर आरी गाड़ी गुड़ाई है।
कुछ भला मिनखां न आ करोना खायगी
जकां लारै रैगया
बाने आ महंगाई धपायगी।
अजी भाईजी मत पुछो:
क्याकि कमाई है?
म्हारो तो जीवड़ो ही जाणें
की किंया घर आरी गाड़ी गुड़ाई है।
घरा बैठ्या-बैठ्या रामु काको बजावै टाली
कमाई रैयी कोनी धेली की
जेब्या होगी सगळी खाली।
अजी भाईजी मत पुछो:
क्याकि कमाई है?
म्हारो तो जीवड़ो ही जाणें
की किंया घर आरी गाड़ी गुड़ाई है।
मास्टर सगळा बढ़ाली दाढ़ी
कुँवारा उडिकता ही रैगया लाडी
अजी भाईजी मत पुछो:
क्याकि कमाई है?
म्हारो तो जीवड़ो ही जाणें
की किंया घर आरी गाड़ी गुड़ाई है।
छोटू भायो कोठी बणावै
रविन्द्र भायै री बढरी तोंद
जेपी जी रा सर का बाळ उड़गा
किशोर भायै की लाम्बी होगी सुई
अब किंया काम चालसी
भौत उंडी होगी जिंदगी री कुई
जाणें कद आसी ढलाण
इंया लागै जिंदगी मांय चढ़ाई ही चढ़ाई है
अजी भाईजी मत पुछो:
क्याकि कमाई है?
म्हारो तो जीवड़ो ही जाणें
की किंया घर आरी गाड़ी गुड़ाई है।
प्यारू भायै री मुस्कान लारै छुटगी
बरषा री हिम्मत-आस सगळी टुटगी
नरेश भाईजी चैयरमैन बण अर
दूसरी जवानी पाई है
अजी भाईजी मत पुछो:
क्याकि कमाई है?
म्हारो तो जीवड़ो ही जाणें
की किंया घर आरी गाड़ी गुड़ाई है।
मूळजी री मुफ़ळी याद आसी
लीलू भायै रा पेड़ा
चिकणे बिन्या कठै कढ़ाई है
अजी भाईजी मत पुछो:
क्याकि कमाई है?
म्हारो तो जीवड़ो ही जाणें
की किंया घर आरी गाड़ी गुड़ाई है।
थारो आपणो कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

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