जहरीला इंसान
नमस्कार मेरी रचना Jaharila Insan आज के इंसान की प्रवर्ति को दिखाती है। हम जानवरों को दोष देते है लेकिन हम इंसान के करतब देखकर तो जानवर भी सोचते होंगे कि इनसे श्रेष्ठ तो हम है। इस कविता को लिखने की प्रेरणा मुझे मेरे परम मित्र जनाब ज़ाकिर हुसैन (गंगापुर सिटी, जिला-सवाई माधोपुर) से मिली है। इस कविता का मुखड़ा 'इंसान, इंसान को डस रहा है सर्प ये देख हंस रहा है' मैंने उनकी अनुमति से उनके शेर से लिया है।

जहरीला इंसान
इंसान, इंसान को डस रहा है
सर्प ये देख हंस रहा है।
'प्रेम' तो बेबस था, बेबस है और बेबस रहा है।।
मानव नित नये रंग बदल रहा है
गिरगिट ये देख हंस रहा है।
'प्रेम' तो बेरंग था, बेरंग है और बेरंग रहा है।।
भाई, भाई को बर्बाद कर रहा है
उल्लू ये देख हंस रहा है।
'प्रेम' तो निश्छल था, निश्छल है और निश्छल रहा है।।
मानुष, मानुष के लहू का प्यासा हो रहा है
शैतान ये देख हंस रहा है।
'प्रेम' तो सरस था, सरस है और सरस रहा है।।
आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)
Jaharila Insan
शायरी
(1)
गर मैं याद नहीं करता हूँ तुमको
तो इसमें मेरी भी कुछ मज़बूरी है।
जीने के लिए तुमसे भी पहले
दो वक्त की रोटी जरुरी है।।
(2)
कौन कहता है कि माता-पिता अपनी संतान में
फर्क नहीं करते ।
इस बात को जानते सब है
लेकिन हम उनका अनादर नहीं करते।।
(3)
जिस-जिस ने अपनों के लिए गम झेले होंगे,
वो मुसीबत में जरूर अकेले होंगे।
(4)
Jaharila Insan
दोष किसका ?
कुछ ने अपने पत्थर को भी
ऐसे तराशा की वो हूर बन गया।
और कुछ ने अपने कोहिनूर
को भी पत्थर बना दिया।।
(5)
वो जो अक्सर कहते थे
प्यार की कोई जुबां नहीं
वो आजकल
पैसों की भाषा बोलने लगे है।
सच है दुनिया वालों
पत्थर भी बोलने लगे है।।
थारो आपणो कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

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