झूठ का बोलबाला है

Pramod Kumar Saini
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Jhuth Ka Bolbala Hai

झूठ का बोलबाला है

नमस्कार हमारी यह रचना Jhuth Ka Bolbala Hai (झूठ का बोलबाला है) आज के समय में झूठ के बोलबाले के बारे में है। आज हम सब केवल और केवल अपने स्वयं लाभ को ही महत्त्व देते  है। हमें केवल और केवल हमारी खुद की पड़ी है। हम सिर्फ अपने स्वयं के हितों की परवाह करते है। 

Jhuth Ka Bolbala Hai

झूठ का बोलबाला है

सच को सच मत कहो
कि झूठ का बोलबाला है
अंधकार है चहुँ ओर
धुंध में उजाला है
बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला है।

भूखा भूख मरता मरे
ध्याये को मिलता बार-बार निवाला है
उसको कोई मार नहीं सकता
ख़ुदा जिसका खुद रखवाला है
बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला है।

पेट भरकर खाने वाले
मोटी कमाई पाने वाले
जरा अपने से भी अलग सोच
गरीब का न कोई संगी न साथी है
वो मर नहीं सकता
प्रभु ने जिसको पाला है
बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला है।

अंधे के हाथ बटेर
कब तक मनाएगी बकरे की माँ खैर
हर अंधेरी रात के बाद होती है सवेर
वो झुक नहीं सकता
जिसने अपने को हर हाल में ढाला है
बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला है।

Jhuth Ka Bolbala Hai

अंधा पिसे कुत्ता खाये
अपनी थाली में छेद किसको सुहाये
पिया वही जो गौरी मन भाये
वो टूट नहीं सकता
तूफानों ने जिसे संभाला है
बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला है।

साँच को आंच नहीं
फिर क्यों झूठ के पुल बांधे जाए
महलों की बस्ती में
झुपड़ पट्टी किसे सुहाये
वो मिट नहीं सकता
मिट्टी खुद जिसे गले लगाए
हार-जीत के इस खेल में
विजेता वो
जिसके गले में माला है
बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला है।

आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

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