इंसानियत के दुश्मन

Pramod Kumar Saini
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इंसानियत के दुश्मन

Insaniyat Ke Dushman

नमस्कार यह मेरी रचना  Insaniyat Ke Dushman (इंसानियत के दुश्मन) इंसान और देश के बदलते हालात को दर्शाती है। आज के समय में इंसान अपना ज़मीर खो चुका है। अब उसके लिए अपना स्वार्थ पहली वरीयता हो गयी है। देश और मुल्क सब बकवास हो गए है। हम सभी को अपने अंदर झांकने की आवश्यकता है। हमें हमारे नैतिक मूल्यों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। हमें हमारे देश को पहली वरीयता पर रखना होगा।

Insaniyat Ke Dushman

Insaniyat Ke Dushman

इंसानियत के दुश्मन

देश का चैन और सुकून बेच दिया
अमन की अब बात मत करो
इंसानियत के दुश्मनों ने
क्या कंकड़-पत्थर, वतन बेच दिया।

गरीब की छत बेच दी
मुसाफ़िर का ठिकाना बेच दिया
मुल्क की मिट्टी हो गई कर्जदार
इंसानियत के दुश्मनों ने
क्या आशियाना, सारा हिंदुस्तान बेच दिया।

अबला की इज्जत बेच दी
परिंदों का चमन बेच दिया
स्वाभिमान हो रहा है शर्मसार
इंसानियत के दुश्मनों ने
क्या बगिया, सारा गुलिस्तान बेच दिया।

मंदिरो की गुम्बद बेच दी
मस्जिदों का सामान बेच दिया
गुरुद्वारों का गर्व हो गया चकनाचूर
इंसानियत के दुश्मनों ने
क्या कब्रिस्तान, श्मसान बेच दिया।

शिक्षकों की सांस छीन ली
पुस्तकों का ज्ञान बेच दिया
अब गुणवत्ता की बात गौण हो गई
इंसानियत के दुश्मनों ने
अपना ईमान बेच दिया।

आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

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