जरा संभलकर
नमस्कार ये हमारी रचना Jara Sambhalkar आज के समय के लोगों की हकीकत को बताती है। आज के समय में लोगों के चेहरे पर कई चेहरे है। हर रोज उन चेहरों के रंग बदल रहे है। अक्सर होता यही है की जो सबसे नजदीक है वही पीठ में खंजर घोपता है। आज के समय में लोगों की जुबानें बहुत मिट्ठी हो गयी है लेकिन दिल में दिमाग होने लगे है। अक्सर किसी को देखा मिट्ठी-मिट्ठी बातों से ही दिया जाता है। अब अपनापन और प्रेम खोता जा रहा है। आइये कविता का आनंद ले।
जरा संभलकर
नियत मौसम की है खराब,
रहना जरा संभलकर।
चेहरे डरावने हो गए आफ़ताब,
जरा संभलकर।।
हर शाख है हरी-हरी,
हर गुल है खिला-खिला।
बागों पर चढ़ गया शबाब,
जरा संभलकर।।
हथेलियां हो गईं है दोस्ताना,
जबान बन गई मीठी।
दुकानों में बिकने लगे नकाब,
जरा संभलकर।।
घाट-घाट की व्यवस्थाएं
होने लगी है दुरुस्त।
पोस्टरों में टँग गया इंकलाब
जरा संभलकर।।
सफेदपोशों की सभाओं में
वादे है, इरादे हैं।
और है बातें बेहिसाब
जरा संभलकर।।
किसपे करें यकीं
किसको माने यारों खुदा
अपनों की भीड़ का नहीं जवाब
जरा संभलकर।।
आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)


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