हौसलों से उड़ने वाले

Pramod Kumar Saini
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हौसलों से उड़ने वाले

नमस्कार दोस्तों मेरी यह रचना Honsalo Se Udne Vale एक ऐसे इंसान को समर्पित है जिसे जिंदगी में परेशानियों ने बहुत परेशान किया। हादसों ने उससे बहुत कुछ छीन लिया। अपनों को जिसने अपने लिए घुट-घुट जीते देखा, पर अपने आप को कभी कमजोर नहीं होने दिया। अपनी हिम्मत को कभी टूटने नहीं दिया।

Honsalo Ki Udan: सम्पूर्ण घटनाक्रम

आज मैं आपको बताने जा रहा हूँ सीकर जिले के कोलीड़ा ग्राम के एक 20 वर्षीय युवक मनीष कुमार जांगिड़ की घटना के बारे में जो स्वभाव से शांत और मृदुभाषी है। जिसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य माता-पिता के सपनो को साकार करना है। पिता द्वारिका प्रसाद जांगिड़ जो कि लकड़ी का काम करने वाले एक सामान्य कारीगर है। माता शशि देवी जो कि एक गृहणी है। बहिन पूजा जांगिड़ जो कि अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर है तथा बी एड कर रही है। द्वारिका प्रसाद और शशि देवी अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर बड़ा बनाना ही अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मानते है। यह एक छोटा सा खुशहाल परिवार था।

Honsalo Se Udne: परिवार और सपने

पर इस परिवार की खुशियों पर कलंक लगा। वह मनहूस दिन था 7 नवम्बर 2020 का, जिस दिन मनीष घर से जयपुर रवाना हुआ एयर फोर्स की एग्जाम देकर माता-पिता के सपनों को साकार करने के लिये। शाम को जब एग्जाम देकर जयपुर से लौटा तो बहुत देर हो गयी थी। वह सीकर पुलिया नवलगढ़ रोड़ पर बस का इंतजार कर रहा था। पर रात के 11 बजे वँहा से कोलीड़ा का सीधा साधन मिलना नामुनकिन था।
अतः मनीष ने वँहा आयी एक लोक परिवहन  की बस जो जयपुर से पिलानी चलती है उसके परिचालक से कोलीड़ा स्टैंड पर उतारने की गुहार लगाई। बस परिचालक ने पहले तो उसे किराये के लालच में बस के अंदर ले लिया। फिर उसे लगा कि बहुत सवारी हो गयी है सीधे ही नवलगढ़, झुंझुनूं, पिलानी की तो उसने मनीष को बस से नीचे उतरने के लिये बाध्य किया। तभी पीछे से एक और लोक परिवहन की बस आ गयी थी।
 

Honsalo Se Udne: विनती और गुहार

मनीष स्वभाव से शांत है अतः उसने भी नीचे उतरना शुरू कर दिया। फिर जल्दबाजी में बस परिचालक ने मनीष को धक्का देकर बस के दरवाजे के फाटक को बंद कर लिया। मनीष के गिरते समय बस के फाटक का हैंडल हाथ लग  गया। लगभग 100 फ़ीट तक मनीष सड़क से रगड़क खाता रहा। मनीष चिल्लाता रहा। मदद की गुहार लगाता रहा। पर बस चालक और परिचालक ने इस पर ध्यान नही दिया। तभी मनीष के हाथ से बस का हैंडल छूट गया और  इस बस के टायर से मनीष का एक पैर कुचल गया।
 

Honsalo Se Udne: मनहूस घड़ी

मनीष के पैर से खून बह रहा था। सड़क खून से लाल हो गयी थी। पर सब लोग वंहा मूक खड़े तमाशा देख रहे थे। तभी एक शिवकुमार महला पुत्र श्री शीशपाल महला ग्राम-उदनसर तहसील-फतेहपुर  नामक युवक हनुमान बनकर सामने आया। रात्रि के 11:40 बजे का समय था। वंही सामने पुलिस चौकी के अधिकारी जो की गुमसुम खड़े सब तमाशा देख रहे थे उनसे शिवकुमार ने मदद की गुहार लगाई।
उनसे पुलिस की गाड़ी में मनीष को अस्पताल ले जाने के लिए कहा उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने मनीष को एम्बुलेंस में ले जाने को कहा। शिवकुमार ने 108 पर कॉल किया। पर शिवकुमार को एम्बुलेंस का इंतजार करना उचित नहीं लगा।  जब शिवकुमार को पुलिस से भी मदद नहीं मिली तो उसने अपने ही स्तर पर प्रयास करने का निश्चय किया। तभी सौभाग्यवंश एक टैक्सी उधर आ गयी। 
 
शिवकुमार ने अपने ही खर्चे पर इस टैक्सी को किराये पर लिया और मनीष को राजकीय कल्याण अस्पताल ले गया। वंही से उसने मनीष के घर पर खबर की।  पिता द्वारिका प्रसाद को जैसे ही यह समाचार मिला तो उनके पैरों के तले से जमीन खिसक गयी। फिर घायल मनीष को जयपुर रैफर कर दिया गया। बहादुर शिवकुमार मनीष और उसके परिजनों के साथ जयपुर गया और वँहा सवाई मानसिंह अस्पताल में मनीष को भर्ती करवा दिया।
 

Honsalo Se Udne: जीवन की आस

आगे चलकर डॉक्टरों को मनीष का पैर काटना पड़ा क्योकि उसके पैर की नसे बहुत ज्यादा कुचल गयी थी। इस घटना का परिवार पर बहुत ही आघात पहुँचा।  यँहा तक की द्वारिका प्रसाद खुद को हृदयघात का झटका लगा। पर ईश्वर की कृपा से वो अब ठीक है। मनीष ने इतना कुछ खोया है लेकिन ये हादसे उसके जज्बे को नहीं झुका पाये। आज भी मनीष मैं वहीं कुछ कर गुजरने का मादा है। उसने अपनी एक टांग जरूर खो दी है लेकिन अपना हौंसला नहीं खोया है।
मेरी यह रचना मनीष के हौंसले को समर्पित है। साथ ही साथ शिवकुमार जैसे बहादुरो को भी सलाम।  जिनके कारण एक घर का चिराग बुझते-बुझते बच गया।  हम सभी को शिवकुमार से प्रेरणा लेनी चाहिए। दूसरे की परेशानी को कभी भी सरदर्द नहीं समझना चाहिए। समाज नेकियों से चलता है स्वार्थ से नहीं। हमारी सरकार को शिवकुमार जैसे बहादुरों का समान करना चाहिए।

हौसलों से उड़ने वाले

 उन्हें बैसाखियों की क्या जरूरत,
जो हौसलों से उड़ा करते है।
तूफ़ान उन्हें क्या रोके,
जो बेख़ौफ़ जिया करते है।।

अपनी बदनसीबी को कोसे,
ऐसे हम नहीं।
नसीब में चाहे जितने भी कांटे हो,
कोई गम नहीं।।

उम्मीदों के बाग लगाऊ,
इतना कमजोर न समझ लेना।
हसरतों के फूल ख़िलाऊ,
इतना बेवकूफ़ न मान लेना।।

मैं तो एक आग का गोला हूँ,
जलता हुआ शोला हूँ।
हाथ न लगाना जल जाओगे।
बहुत तड़पा हूँ जमाने वालों,
अब और कितना तड़पाओगे।।

अरमां मेरे सब काफूर हो गये,
वो सो गुनाह करके भी
बेकसूर हो गये।
हम है की अब भी जिद्द पर अड़े है,
पैरों ने साथ छोड़ दिया तो क्या?
हौसलों पर जिंदा खड़े है।।

वक्त सबका आता है,
फिर क्यों मन तेरा घबराता है।
इंसा रोता आता है 
और रुलाकर जाता है।
कोई पहले तो कोई बाद में,
खुदा सबको अपने पास बुलाता है।

ज़िंदगी मिली है,
कुछ कर गुजरने के लिये।
फिर क्यों आँसुओ के घूँट पिये,
आओ 'मनीष' जीवन ऐसा जिये।
की सब तरफ जल उठे घी के दिये।।

आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

हौसलों से उड़ने वाले


मनीष घटना से पहले 

हौसलों से उड़ने वाले
मनीष घटना के बाद 

हौसलों से उड़ने वाले
शिवकुमार



अगर आपको मनीष की वास्तविक, दिल को झकझोर देनी वाली घटना ने प्रभावित किया है तो अपने विचार, संवेदना या प्रेरणा मनीष तक पहुँचाये और ज्यादा से ज्यादा कमेंट करें।  ये मनीष के मनोबल को और ऊपर उठायेंगे। 







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5Comments

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  1. दर्द का दरिया पार करके आया हूं,
    दो जख्मो से आसमान का रास्ता छोड़ दू....
    इतना कायर में हूं नही....

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  2. Dono mhan personalities ko prnam🙏🙏aap ki himmt sir k sabdon me byan hone se bhot se logo ko honsla degi 🙏🙏

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