अब तो जाग कब समझेगा तू इंसान।

Pramod Kumar Saini
6

 

अब तो जाग
कब समझेगा तू इंसान

नमस्कार दोस्तों इस काव्य रचना Ab To Jag Kab Samjhega Tu Insan में हम आपको बताना चाहते है की इंसान भी अन्य जीवों की तरह एक सामान्य प्राणी ही है लेकिन इसने अपने दिमाग के बल पर सभी जीवों को अपना गुलाम बना लिया है और अब यह अपनी हद खो चूका है।  क्या सही है और क्या गलत सब भूल चूका है। इंसान बस अपने खुद के उदेश्यों की प्राप्ति के लिए कुछ भी कर सकता है। पर वो ये नहीं जानता है की प्रकृति खुद अपना संतुलन बना लेती है। जिस दिन प्रकृति अपना रूप दिखाएगी तो इस इंसान को बहुत पछताना होगा। अब जो हमें बार बार इन प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है वो हमारे द्वारा प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ किया गया है उसका ही एक परिणाम है। 

अब तो जाग  कब समझेगा तू इंसान।


अब तो जाग
कब समझेगा तू इंसान

बुलबुले की क्या हस्ती?

और क्या औकात?

पलक झुके तो परवान पर

पलक उठे तो मैदान पर।

अब तो जाग

कब समझेगा तू इंसान।


पत्ते को क्या पता 

अपनी पहचान?

करे न तनिक भी अभिमान

नश्वर का जीवन से मोह कैसा?

उसके लिये जीवन-मरण सब एक समान।

अब तो जाग

कब समझेगा तू इंसान।


चिट्टी को चढ़ाई का डर कैसा?

थकान से है जो अंजान

प्रेरित करती है जिसकी हर हरकत

जगा देती है पतित का भी स्वाभिमान।

अब तो जाग

कब समझेगा तू इंसान।


आपका अपना कवि

प्रमोद कुमार सैनी

(प्रेम)

Post a Comment

6Comments

Please do not enter any spam link in the comment box.

  1. स्वाभिमान से बड़ा कोई गहना नहीं होता और ये गहना हर किसी ने पहना नहीं होता।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत गजब बात है आपकी

      Delete
  2. बहुत सुंदर लिखा है सर

    ReplyDelete
  3. Bahut sandar ✍✍✍👌👌

    ReplyDelete
Post a Comment