गूँगी और बहरी सरकार

Pramod Kumar Saini
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 गूँगी और बहरी सरकार

नमस्कार दोस्तों हमरारी यह रचना Gungi Or Bahari Sarkar किसानों पर थोपे जा रहे कानूनों के बारें में है। देश की सरकार उनके बारे में नहीं सोच रही है। आज देश का किसान अगर खेतों को छोड़कर अगर सड़क पर बैठा है तो क्यों ? क्योंकि वो आगे की सोच रहे है।  अगर ये कानून पास हो जाते है तो किसान पूंजीपतियों के गुलाम बन जायेंगे। ये पूंजीपति वर्ग सब मिलकर किसानों का जीना हराम कर देंगे।  हमारी सरकार को किसानों की पीड़ा को समझाना चाहिए। इनसे बात कर कोई न कोई बिच का हल जरूर ढूँढना चाहिए। लोकतंत्र को जब देश के लोगों ने अपनाया था तो उनकी भी यही सोच थी की सरकार जनता के हित में काम करें न की एक विशेष वर्ग के हित में -

गूँगी और बहरी सरकार।


गूँगी और बहरी सरकार

हाय रे ये कैसा अत्याचार

अन्नदाता घुट घुट मरने को लाचार

सुनकर भी अनसुनी करें

गूँगी और बहरी सरकार।


हाय रे ये कैसा अत्याचार

सब अपने अपने घर बैठे

हलधर करें बहिष्कार

गूँगी और बहरी सरकार।


हाय रे ये कैसा अत्याचार

गरीब की मेहनत बेकार

उसके मालिक बन बैठे हजार

गूँगी और बहरी सरकार।


हाय रे ये कैसा अत्याचार

कड़ाके की ठंड में

ज़िंदगी टिक जाती है सोड़ पर

कृषक बैठा रोड़ पर

तमाशा देखे सारा संसार

गूँगी और बहरी सरकार।


हाय रे ये कैसा अत्याचार

मजबूरी के नाम हजार

बिकने को है तैयार घर-बार

गूँगी और बहरी सरकार।


आपका अपना कवि

प्रमोद कुमार सैनी

(प्रेम)

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