जरूरत है
नमस्कार ये मेरी रचना A Poem On Need (जरूरत है) हमें बताती है की हम सब को एक दूसरे की जरूरत है। प्रकृति में अकेला चना पहाड़ नहीं फोड़ सकता है। हम सबको किसी न किसी चीज की जरूरत है। यह कविता दिखती है की प्रकृति की साडी चीजों को एक दूसरे की जरूरत है।
जरूरत है
जरूरत है
दिल को धड़कन की
आत्मा को तनमन की
जरूरत है
साज को बजैया की
नइया को खिवैया की
जरूरत है
बसंत को बहार की
खुशबू को बयार की
जरूरत है
पायल को झंकार की
शायर को श्रृंगार की
जरूरत है
प्यासे को पानी की
भूखे को धानी की
जरूरत है
गुल को बुलबुल की
सितारों को झीलमिल की
जरूरत है
नदियाँ को सागर की
बूँद को गागर की
जरूरत है
गुणी को ज्ञान की
तेजस्वी को मान की
जरूरत है
पुस्तक को पाठक की
साधना को साधक की
जरूरत है
तप को ताप की
मंत्र को जाप की
जरूरत है
गुरु को शिष्य की
भिक्षुक को भिक्ष्य की
जरूरत है
कर्म को कर्मवीर की
धर्म को धर्मवीर की
जरूरत है
अपराधी को हथियार की
सद्चरित्र को संस्कार की
जरूरत है
कार्य को निर्माण की
धनुष को बाण की
जरूरत है
व्यक्तित्व को पहचान की
स्वाभिमान को ईमान की
जरूरत है
सावन को बरसात की
भावुक को जज़्बात की
जरूरत है
हया को लाज की
शाहजहां को मुमताज की
जरूरत है
पक्षी को घोंसले की
पतित को होंसले की
जरूरत है
पेट को निवाले की
दिलदार को दिलवाले की
जरूरत है
पत्थर को मूरत की
सुंदर को सूरत की
जरूरत है
उड़ने को आकाश की
प्रगति को विकास की
जरूरत है
भीड़ को नेता की
कहानी को अभिनेता की
जरूरत है
अनपढ़ को आखर की
देश को साक्षर की
जरूरत है
पेड़ को शाखा की
साधु को आखा की
जरूरत है
धूमिल को प्रकाश की
दोस्ती को विश्वास की
जरूरत है
झूठ को सांच की
ईंधन को आंच की
जरूरत है
नारी को करुणा की
यौवन को तरुणा की
जरूरत है
साज को आवाज की
आह को आगाज की
जरूरत है
हीरे को जौहरी की
विदूषक को ठिठौरी की
जरूरत है
आलस्य को आराम की
सतत को विराम की
जरूरत है
माँ को मर्म की
सजनी को शर्म की
जरूरत है.....
जरूरत है.....
जरूरत है.....
प्रमोद कुमार सैनी (प्रेम)


Please do not enter any spam link in the comment box.