चापलूसी: एक काव्य कथा

Pramod Kumar Saini
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चापलूसी

एक काव्य कथा

नमस्कार मेरी यह रचना A Poem On Flattery (चापलूसी: एक काव्य कथा) समाज में बढ़ती हुई चमचागिरी को बताती है। आज के समय में हर अयोग्य व्यक्ति अपने आप को बनाये रखने के लिए चापलूसी का सहारा लेता है। मेरी नजर में चापलूसी कमजोर और अयोग्य व्यक्तियों का साधन है। जो योग्य है वे इसका प्रयोग नहीं करते है। 

चापलूसी एक काव्य कथा

चापलूसी: एक काव्य कथा

मुझे आदत है बड़बड़ाने की,
हर काम में टांग अड़ाने की।
आज न किसी पर कीचड़ फेंकूँगा,
सच कड़वा होता है;
पर साथियों मैं तो सच ही बोलूँगा।

नवरात्रि के इस पावन पर्व पर,
आपको दुआ सलाम करता हूँ।
इजाजत हो तो,
और आगे अर्ज करता हूँ।

मैं बोल रहा हूँ,
मेरी लाचारी है।
तुम समझो, न समझो;
तुम्हारी समझदारी है।

हर जगह कुछ चमचे होते है,
जिनकी तोंद मोटी और सर गंजे होते है।
कुछ सूखे पापड़ होते है,
अपनी ही अकड़ में रहते है;
खुद को ही खुदा कहते है।

वो जो बोले वो सब सच हो जाता है,
और हम जो बोले तो पंगे होते है।
सच्चाई, ईमानदारी और मेहनत
जिसने अपनाई है,
उसी ने अपने पैरों पर
कुल्हाड़ी चलाई है।
जिसने की तेल-मालिश
उसी को मिलती वाह-वाही है।

कलयुग का है सब खेल,
जमकर लगाओ 
अपने-अपने मालिकों को तेल।
तभी तो तुम टिक पाओगें,
वरना कंही ठोकर;
कंही किक खाओगे।

हर सुबह हर शाम,
ऐसे गीदड़ भोकेंगे।
तुम्हारे साथ रहकर,
तुम्हारी पीठ में ही छुरा घोपेंगे।

चापलूसी एक काव्य कथा



नवरात्रि के पावन पर्व पर,
एक बात पते की बताता हूँ।
चाहे तुम पढ़-लिखकर 
कितने ही बड़े बन जाना,
पर किसी का चमचा जरूर बन जाना।

गर तुम नहीं बन पाये चम्मचे,
तो दर-दर की ठोकर खाओगे।
हवा में न उड़ पाओगें,
ग्यारह नंबर की ही
गाड़ी चलाओगे।
और आने वाली पीढियों को,
मेरी तरह फिर चम्मचों की कथा सुनाओगे।

आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी (प्रेम)

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