रुखाळीयो

Pramod Kumar Saini
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रुखाळीयो

नमस्कार दोस्तों! ये मेरी रचना Rukhaliyo (रुखाळीयो) समाज, परिवार  में मुखिया की भूमिका को दर्शाती है। हम सभी जानते है की समाज बहुत तेजी से बदल रहा है। इसके साथ-साथ बदल रहे है सामाजिक व्यवहार। हम हमारी पुराणी संस्कृति को भूल रहे है और जिस नवीन संस्कृति को अपना रहे है वो हमारे समाज में बहुत सारे विकार भी ला रही है। आइये कविता का आनंद ले -

रुखाळीयो

रुखाळीयो

न फळसो रैयो, न रैयी पोळी
न ही बच्यो घरां मांय ढाळीयो
बिन्या लग़ाम की नार होगी
कुँवारों डोले छोरों काळीयो
भरया खेत डांगर चरे
जाणे कठै लुखकर बैठ्यो है रुखाळीयो

न शर्म रैयी, न रैयो संको
न ही बची मान-मनुवार
आधी उघाड़ी डोळे छोरियां बीच बज़ार
घरां न गण्डक रुखालै
सूनो पड़्यो है माळीयो
भरया खेत डांगर चरे
जाणे कठै लुखकर बैठ्यो है रुखाळीयो

न सुख रैयो, न रैयी सम्प्पत
अब सागै बैठ सके न मिनख च्यार
ख़र्चे रो हिसाब रैयो कोनी
जणे-जणे के चढरी उधार
पीथा भाया थे तो थारे जीव कं इसयों पमपाळ मत पाळीयो
भरया खेत डांगर चरे
जाणे कठै लुखकर बैठ्यो है रुखाळीयो

न गोठ रैयी, न रैयी घूघरी
न बची भाई-भाई की बोळ-बतलावण
पिलंग पर सोवण आरा कै जाणे माचो, अर कै जाणे दावण
मंगळा भाया जमानो बदळगो
आपणे तो सगळा साक-गौत टाळीयो
भरया खेत डांगर चरे
जाणे कठै लुखकर बैठ्यो है रुखाळीयो

थारो आपणो कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

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5Comments

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  1. बहुत सुंदर रचना

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  2. वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों को दर्शाती हुई बहुत शानदार रचना
    बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार सरजी 🙏🙏🙏

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  3. Baat to Ghanii kardi or sanchi h 👌👌

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  4. बहुत शानदार ऐसी कविता जो ज़मीनी हकीकत को रख दे आप k सामने

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