ओ पेपर आउट कोनी होयो है साहब

Pramod Kumar Saini
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Exam Paper Out

ओ पेपर आउट कोनी होयो है साहब

नमस्कार दोस्तों! ये मेरी रचना Exam Paper Out (ओ पेपर आउट कोनी होयो है साहब) आज के समय में लगातार युवाओं के साथ हो रहे खिलवाड़ पर है। एक गरीब परिवार का युवा न जाने किस हाल में घर छोड़कर शहर आकर महंगी-महंगी कोचिंगों में सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करता है। पर जब उस परीक्षा के लगने का समय आता है तो पेपर आउट हो जाता है। क्या सरकारी नौकरी पर केवल अमीर का ही हक हो गया है। यह कविता एक तैयारी करने वाले युवा के मर्म को दर्शाती है। आइये कविता का आनंद ले -

Exam Paper Out
 

Exam Paper Out

ओ पेपर आउट कोनी होयो है साहब

(i)

बूढ़े बाप रां अरमान कुचळ दिया
माँ री सगळी मन्नत मिला दी माटी मं।
ओ पेपर आउट कोनी होयो है साहब
राख मिलगी बाटी मं।।

(ii)

खेत खलियान सगळा बिकगा
कोचिंगा री फीस चुकाणे मं।
घर का सगळा गहणा गिरवी पड़गा
औलाद नै सरकारी नोकर बणाणे मं।।

Exam Paper Out

ओ पेपर आउट कोनी होयो है साहब

(iii)

बहण रां हाथ पीळा करना है
भाई री पढ़ाई है बाकी।
इंया ही पेपर आउट होता रिया
तो किंया चाल सी घरां री चाकी।।

(iv)

भाख पड़े उठू, रात ढलै सोऊँ
सपना रो पुरो होणे रो टैम उडिकु
मेहनत री क्यारी नित नित बोउ।
जद सुणु पेपर आउट री खबर
सगळी सुध बुध खोऊँ।।

Exam Paper Out

ओ पेपर आउट कोनी होयो है साहब

(v)

अब किंया ब्याज पर ब्याज चुका स्यु
अब किंया गाँव मांय मुँह दिखासयुं
जणो जणो उड़ासी म्हारी खिली।
ओ पेपर आउट कोनी होयो साहब
म्हारी जवानी कर दी ढीली।।

(vi)

जद इंया ही पेपर आउट होसी
तो कुण मेहनत करसी।
पिसा रो ही अफसर बणसी
गरीब तो इंया ही घुट-घुट मरसी।।

आपका अपना कवि 

प्रमोद कुमार सैनी 

(प्रेम)

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