Distribution of Festivals
त्योहारा रो बटवारों
नमस्कार दोस्तों! ये मेरी रचना Distribution of Festivals (त्योहारा रो बटवारों) आज के समाज में बढ़ते पांखड के ऊपर एक शानदार व्यंग्य है। इसके माध्यम से हमने समाज की बढती बुराईयों की और आप सबका ध्यान खींचने की कोशिश की है। आशा है यह आपके पसंद आएगी। आइये कविता का आनंद ले -
Distribution of Festivals
त्योहारा रो बटवारों
बदलते जमाने री रीत निराळी
इंसान बचा न कोई
कोई जाट, कोई ब्राह्मण,
कोई बणिया और कोई माळी
सगळा को अलग-अलग है नारो
हर त्यौहार धुकेगो न्यारो-न्यारो
कमली भाभी इतवार न तीज मनावे
काळे कुते न गुलगला खुवावे
रमेशजी पुजारी की अलग होशियारी
इतवार न खुद जिम्मे घर-घर
सोमवार न घर म देव धुकावे बारी बारी
किशोर भाईजी के घरा भद्रा सूं राखी रुकगी
अठीन मधु भाईजी की दुकान पर जनता सगळी झुकगी
खाती, कुम्हार और के लौहार
भद्रा मांय राखी बांध जीवंता फिर रिया है
बठीन चोटिया जी को राग निराळो
पहले दिन घरारी राखी बाँधन जावै
दूजे दिन बहना ने बुलावै
सगळा त्यौहारा रो बंटवारों होगो
पैली थे धोको पछे म्हाने दयो मौको
वाह सा गिरधारीजी थे जोरका
हर त्यौहार सातू सांझ धोको
मौको मिलता ही मार दयो चौको
आ ही हालत रैयी तो
बो दिन भी आसी
नरोत्तम भाईजी सातू बार
सम्पूर्ण सुंदर कांड गासी
और सगळा आप आप को त्यौहार
आप आप की मर्जी सूं मनासी
अर कोई के किती ही मिर्च लागे
ओ 'प्रेम' तो यूं ही कविता बणासी।
आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)


Please do not enter any spam link in the comment box.