मतकर मदिरापान

Pramod Kumar Saini
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Mat Kar Madira Pan

मतकर मदिरापान

जय राजस्थान! जय राजस्थानी ! म्हारी आ रचना Mat Kar Madira Pan (मतकर मदिरापान) आपणे  समाज माथै फैल रैयी इण बुराई नै दूर करबा रो महारों इण कविता रै माध्यम सूं इक प्रयास है सा। आ बीमारी आज आपणे देश री जड़ा नै दीमक री जिंया खा री है। 

Mat Kar Madira Pan

Madirapan Or Insan

मदिरापान और इंसान

(१)

महल बिकगा, 

बिकगा सगळा माळीया

बरतण बासण बिकगा, 

बिकगा खेत मकान

अब तो जाग भला मिनख, 

आ झूठी तेरी शान।

इज्जत भी बिक ज्यासी, 

मतकर मदिरापान।

मतकर मदिरापान।।

Chod De Murk Madirapan

छोड़ दे मुर्ख मदिरापान

(२)

ओबरी मांय ऊंदरा बोलै, 

अडाव मांय क्याकि लावणी

भैत बिन्या क्याका ठाण, 

जयैठ री तावड़ी मांय कद मंडे मंडाण

तूड़ी मांय कै छांटे छाजलो

टाबरिया री बिलख न पहचान।

मतकर मदिरापान,

मतकर मदिरापान।।

Madira Mot Ka Saman

मदिरा मौत का सामान

(३)

खाली पड़ी बिलौवनी, 

छाणो उडीकै चुलौ

धौरा किण रो अहसान राखै

बळद जुतेड़ों ही लागै चोखौ

कंगाल छैल गांव ने भारी

किंया मति मारी गई थारी

आ पपुड़े सूं किंया चुकसी 

थारी उधारी

अब तो छोड़ दे आ 'दुकान'

मतकर मदिरापान,

मतकर मदिरापान।।

Mat Kar Madira Pan

Mat Kar Madira Pan

मतकर मदिरापान

(४)

आ मरज्याणी घर मं कुबद करावै

सांझ ढळया इण री ओळयू आवै

कलह कलासे पेंडे को पाणी नासे

टके की भी कीमत रेई कोनी अब थारी

लाज शर्म सगळी बेच खाई थे सारी

आ काया कै लगाई थे बीमारी

थारी बाट उडीकै श्मशान

मतकर मदिरापान,

मतकर मदिरापान।।

Madira Mot Ka Bulava

मदिरा मौत का बुलावा

(५)

चालणी में दुव दूध, 

करमां ने देव: दोस

मरवण थारी बाट उडीकै

क्यूं होरया हो थे मदहोश

भला मिनख स्याणी बात कैगा

'जावो कलकत्ते सूं आगे, 

करम छाँवली सागै'

पलै बांध ल्यो ओ ज्ञान

मतकर मदिरापान,

मतकर मदिरापान।।

कठिन शब्दार्थ-1

*ओबरी – अनाज व उपयोगी सामान को रखने के लिये बनाया गया मिट्टी का उपकरण (कोटला)

*ऊंदरा - चूहा

*अडाव – जब लगातार काम में लेने से भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाने पर उसको खाली छोड़ दिया जाता है

*लावणी - फसल को काटकर अनाज निकालने के लिये इकट्ठा करने की प्रक्रिया

*भैत - पालतू जानवर

*ठाण - पालतू जानवरों को बैठने का स्थान

*मंडाण - बारिश के बादलों का आना

*तूड़ी - सुखी फसल का बना चारा

*छाजलो - अनाज और चारे को अलग करने का उपकरण

*टाबरिया - बच्चे

*बिलख - चीख-पुकार

*बिलौवनी - दही से मख्खन निकालने में प्रयुक्त बर्तन

*छाणो - पशुओं के मल से बना ईंधन

कठिन शब्दार्थ-2

*कंगाल छैल गांव ने भारी - यहां कंगाल से आशय गरीब से है और छैल का अर्थ होता है शौकीन और जो अमीर होने का दिखावा करता है। ऐसा व्यक्ति जिसके पास खर्च करने के लिए पैसे नहीं हो लेकिन उसके शौक बहुत बड़े हो और वह अपने शौक पूरे करने के लिए अपने परिवार जनों को परेशान करता है। ऐसा व्यक्ति अपने परिवार को ही नहीं पूरे गांव को परेशानी में डाल देता है।

*मति -अक्ल

*कुबद - लड़ाई-झगड़ा

*ओळयू - याद

*कलह कलासे पेंडे को पाणी नासे - कलह कलासे (कलह और क्लेश मतलब घर में लड़ाई झगड़ा) घर में अगर क्लेश हो, कलह हो तो पेंडे (घर में पानी के मटके रखने की जगह) में रखा हुआ पानी भी नष्ट हो जाता है। अथार्त गृह क्लेश से घर में हर वस्तु का नुकसान होता है। अतः शान्ति और वैभव उसी घर में आते हैं, लक्ष्मी जी उसी घर में वास करती है जहां पर शान्ति होती है।

*चालणी में दुव दूध, करमां ने देव: दोस - चालनी (छलनी) में दूध दुव (दुहना, निकालना)।कार्य को सही तरीके से ना करना और भाग्य को दोष देना ही इस कहावत का अर्थ है।

*जावो कलकत्ते सूं आगे, करम छाँवली सागै - इस कहावत का अर्थ है आप चाहे जहां चले जाएं आपके कर्म आपके साथ जाएंगे और आपकी किस्मत जगह बदलने से नहीं बदलती है। वह कर्म करने से, मेहनत करने से बदलती है।

आपका अपना कवि 

प्रमोद कुमार सैनी 

(प्रेम)

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