Changes in the Society
बदळाव री घड़ी
नमस्कार दोस्तों मेरी यह रचना Changes in the Society, (बदळाव री घड़ी) समाज में आये भिन्न-भिन्न प्रकार के बदलाव को दिखाती है। इस रचना में मैंने समाज में आई विशंगतियों को आपके सामने लाने का प्रयास किया है। आइये कविता का आनंद ले -

Changes in the Society
बदळाव री घड़ी
(१)
दिन को उज्याळो बदळयो
रात को बदळयो रुख
तीज-त्योहार बदळया
हिवड़ो रो लूट गयो सुख
(२)
उँदायलै री तावड़ी बदळी
सियालै रो बदळयो जाड़ो
घाबलिया रो पहराण बदळगो
रैयो नर अर नार उघाड़े को उघाड़ो
(३)
घरा रो खानपान बदळगो
बोलण रौ रैयो कोनी कोई ढंग
टाबरिया मोबाइल मं घुस रिया
देख अर इण न आंख्या रेगी तंग
(४)
रिपये रो व्यवहार बदळगो
रिश्तेदारा री बदळगी जान- जुहारी
बुढा बड़का घुट घुट मर रिया
घर मं गंडका री हो री खातेरदारी
आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

Very nice
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