चलो अब गाँव चलते है
नमस्कार हमारी रचना Chalo Ab Ganv Chalte Hai (शहर से जी भर गया चलो अब गाँव चलते है।) हमें शहर के आभासी और अवास्तविक जीवन शैली से गाँव की मधुरता और अपनेपन से जोड़ती है। इस कविता को लिखने की प्रेरणा मुझे इग्लिश गुरु श्रीमान साजिद खान से मिली। कविता का मुखड़ा उनके व्हाट्सप्प स्टेटस से उनकी अनुमति से लिया गया है। उन्होंने मुझे एक सम्पूर्ण कविता लिखने के लिए प्रेरित किया और अब कविता आपके समक्ष है। आइये कविता का आनंद लेते है-

चलो अब गाँव चलते है।
Ab Ganv Chalte Hai
छोड़कर एसी और कूलर
पीपल की छाँव चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर जहर घुली आबो हवा को
बरगद की ठंडी छाँव चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर ब्रेड-बटर की बकवास को
खीर-खांड की तलाश चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर बन्द चाहरदीवारी को
खुले आसमान के तले चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर झूठे रिश्ते-नातों को
अपनेपन की मिठास चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर भागदौड़ की जिंदगी को
शुकुन की साँझ चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर घुटन भरी जिंदगानी को
घर-घर झांकती मुस्कान चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर इस मायावी नगरी को
रिश्तों के असली अहसास चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर अजनबियों से भरी गलियों को
अपनों की राह चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर बेगानों की महफ़िल को
अपनों के हर्षोल्लास चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
छोड़कर व्यसनों से भरी बस्ती को
सनातन संस्कृति के बाग चलते है
शहर से जी भर गया
चलो अब गाँव चलते है।
आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

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