ज़िल्लत की ज़िंदगी

Pramod Kumar Saini
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Zillat Ki Zindagi

ज़िल्लत की ज़िंदगी

नमस्कार आज की ये मेरी रचना Zillat Ki Zindagi एक बेहतरीन काव्य कुञ्ज है। ये आपको अपने जीवन में मन सम्मान के बारे में बताएगी। इसमें हमने आपको हमरे जीवन में स्वाभिमान के महत्त्व को काव्य के माध्यम से बताने की एक छोटी सी कोशिश की है।  आइये काव्य का आनन्द ले- 


ज़िल्लत की ज़िंदगी

ज़िल्लत की ज़िंदगी

 (1)

पगड़ी रखकर गैरो के पांव में,
बताओ? ज़मीर बेचा है तुमने
किस भाव में?
ये जिल्लत की जिदंगी
किस काम की?
इतनी भी क्या जरूरत है
तुम्हें दाम की?

प्रमोद कुमार सैनी (प्रेम)


(2)
जीत निश्चित हो 
तो कायर भी लड़ सकता है
बहादुर तो वो है जो हार निश्चित हो
फिर भी मैदान न छोड़े।

प्रमोद कुमार सैनी (प्रेम)


(3)
तू वीर है
भारत की तक़दीर है
तू हिमालय है
तू ही रेगिस्तान है
तुम से ही भारत की शान है
तुम पर हमें बहुत अभिमान है

प्रमोद कुमार सैनी (प्रेम)


(4)
आसमां में घर बनाना 
मेरा मकसद नहीं
मेरी मंजिल है
वतन की जमीं की हिफाज़त
क्या बर्फ, क्या मिट्टी
और क्या पानी
दुश्मन को हर मोर्चे पर
याद दिला दु नानी
मैं हूँ वीर हिंदुस्तानी।

प्रमोद कुमार सैनी (प्रेम)


(5)
अंधी, गूँगी और बहरी सरकार
तुमको बारंबार मेरा नमस्कार
पल-पल बढ़ता अत्याचार
बहुत कड़वे है मेरे विचार
जाने कब होगा सुधार
बात-बात पर होता बहिष्कार
फीका पड़ता बाज़ार
आमदनी को चढ़ गया बुखार
फीके पड़ते संस्कार
खो रही है बगिया की बहार
मेंढ़क व्यवस्था को मेरा
शत शत नमस्कार।।

प्रमोद कुमार सैनी (प्रेम)

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धन्यवाद।।
आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी (प्रेम)

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