आ महंगाई सोक्या न खासी

Pramod Kumar Saini
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 महंगाई

नमस्कार दोस्तों ! आज हम आपके सामने लेकर आये है आज के समय की सबसे बड़ी समस्या महंगाई पर हमारी काव्य रचना जिसका शीर्षक है mahangai sokya na khasi इस कविता में आम आदमी की पीड़ा को दर्शाया गया है।

 
आ महंगाई सोक्या न खासी

महंगाई

 महंगाई सोक्या न खासी।

बिच्यारो आम आदमी कठै जासी।।


मं बोल्यो महारली घराळी सः-

आ महंगाई की चिड़िया को नाम छः?

बा बोली-

दाळ, चना सब लागै फीका

चीणी होगी बोळी मीठी

मसाला होगा सगळा तीखा।


आ महंगाई सोक्या न खासी।

बिच्यारो आम आदमी कठै जासी।।


मं बोल्यो महारली घराळी सः-

अब किंया काम चालसी?

बा बोली-

तेल त्योहारा ही बपराओ

अब तो ग्यारा नम्बर री गाडी सूं 

ही काम चलाओ

पिज्जा, बर्गर का चोंचला छोड़ो

पापड़, मंगोड़ी सूं नातो जोड़ो।।


आ महंगाई सोक्या न खासी।

बिच्यारो आम आदमी कठै जासी।।


मं बोल्यो महारली घराळी सः-

अब क्यामे बड़संया?

ई कालका सूं किंया लड़संया?

बा बोली-

मां, बापू अर टाबर-टोळया न समझाओ

घर मं जीती जरूरत है बितो ही बपराओ

खर्चे रो हिसाब राखो

रिपये री जिंगा लगाओ टको।।


आ महंगाई सोक्या न खासी।

बिच्यारो आम आदमी कठै जासी।।


थारो आपणो कवि

प्रमोद कुमार सैनी

(प्रेम)


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