खामोश आवाज

Pramod Kumar Saini
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खामोश आवाज

नमस्कार इस पोस्ट Khamosh Aawaj में हम आपके लिए लेकर आये है एक काव्य रचना जिसमे एक सामान्य आदमी के मनोभावों को लिया गया है। आज के इस संसार में आम आदमी के मनोभावों की कोई कद्र नहीं है। हर बार आम आदमी का ही शोषण होता है। उसे अपने जीवन में बहुत सारे काम करने पड़ते है।  उस पर परिवार , पति , पत्नी , माता - पिता और बच्चों की जिम्मेदारियां होती है।

वह सुबह उठता है तो इस चिंता में की कैसे वह आज अपने परिवार का पेट भरेगा और सोता है तो इस आशा में की कल का सूरज उसके जीवन में जरूर उजाला लाएगा। इसी दौड़ धुप में वह अपना बचपन, जवानी और बुढ़ापा सब दांव पर लगा देता है। मगर कभी भी वो अपने जीवन में अपने खुद के भावों की परवाह नहीं करता है। उसे भी अपने सपने पूरा करने का हक़ है। हमें उसके भावों की क़द्र करनी चाहिए। आओ एक आम आदमी के दर्द को समझे उसे महसूस करें -

 

खामोश आवाज

खामोश आवाज


भीड़ भरे इस शहर में,
वीरान खंडहर हूँ मैं।

चहल-पहल है चारों ओर,
शांत समंदर हूँ मैं।

ख्वाब है दिल में कई,
सजाये कोई नीड़ नई।

ग़ैरत का पर्दा हटा कर देखो,
कैसी है मेरी छवि।

बनते है रोज अफ़साने,
पहले तो नये फिर पुराने।

यादों के मोती समेट लो,
क्यों चले हो भुलाने।

आपका अपना कवि
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

कठिन शब्दार्थ
1. वीरान- सुनसान/उजड़ा हुआ
2. खंडहर- उजड़ा हुआ भवन
3. नीड़- नव-निर्माण
4. ग़ैरत- द्वेष/घृणा

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