Na Gholo Zahar Fijao Me
न घोलो ज़हर फिजाओं में
नमस्कार दोस्तों आज कि मेरी रचना Na Gholo Zahar Fijao Me लेकर आपके सामने एक बार फिर प्रस्तुत हूँ। यह रचना हमें आगाह करती है कि हमारे सब कर्मो का असर हम सब पर होता है -
न घोलो ज़हर फिजाओं में
1.
इतना न घोलों ज़हर फिजाओं में,
कि सांस लेना मुश्किल हो जाये।
रोक लो अब भी अपने बाजुओं को,
कंही कंधे शर्म से झुक न जाये।।
बेचैनी सी क्यो है?
2.
जाने हर तरफ बेचैनी सी क्यों है
हवाओं में
घनघोर अंधेरा सा छाया है
अब निगाहों में
शुकूँ कंही खो गया है
अनजानी राहों में
काश की ये गम के बादल छंट जाये
हम फिर से गुलशन को महकाये
तितली उड़े गगन-गगन
भंवरे हर कली को महकाये
पैगाम मेरा पहुंचे डगर डगर
फिर से झूमे नगर नगर
बेअसर हो अब हर ज़हर ज़हर
ख़ुदा अब तो कर बन्दों पर महर महर
मैं हूँ वही
3.
जो कभी टूट कर रुकता नही
जो कभी टूट कर झुकता नही
मैं हूँ वही
मैं हूँ वही
आग लगी है सीने में
4.
सुलग रही है आग सीने में
क्या मजा ऐसी ठंडी हवा में
जीने में
झुलस गये है कई अरमां टप-टप
टपकते पसीने में
अब तो हर किसी को खोट नजर
आने लगी है नगीने में
कभी अर्श पे थे
5.
कैसे दु तुम्हे मैं बधाई
ये जो तुमने की है कमाई
कभी तुम्हे अर्श पे छोड़ा था
तब भी अभिमान न था
आज फर्श पर हो
और महक सारी बगिया में है
आपके द्वारा हमारे ब्लॉग को दिए गए बहुमुल्य समय के लिये हम आपके आभारी है।
धन्यवाद।।
प्रमोद कुमार सैनी

Superb
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