मिट्ठी सी चुभन है चाहत
नमस्कार दोस्तों!!!
इस ब्लॉग में मैं लेकर आया हूँ मेरी एक बेहतरीन काव्य रचना चाहत । यह रचना मेरेे काव्य जीवन के शुरुआती चरण की एक रचना है। इस रचना के माध्यम से मैंने यह बताने की कोशिश की है की प्रकृति के कण-कण में चाहत बसी हुई है। चाहत या प्रेम ही है जो एक व्यक्ति या वस्तु को दूसरे व्यक्ति या वस्तु सेेे जोड़ें हुए हैं।
चाहत
मीठी सी चुभन है चाहत
कभी न बुझने वाली अगन है चाहत
भंवरे का कली से,
चांद का चकोर से
दिलों के बीच रिश्ता है चाहत
शायर का श्रृंगार से,
वीर का तलवार से
पल पल का अनूठा संजोग है चाहत
बसंत का बहार से,
खुशबू का बयार से
तड़पते दिलों का मिलाप है चाहत
कभी मिलना,
कभी बिछड़ना
आपस में हल्की सी तकरार भी है चाहत
सांसो का धड़कनों से,
होठों का जुबां से
पहले प्यार का इजहार है चाहत
धरती का गगन से,
सुबह का शाम से
जन्म जन्मांतर का नाता है चाहत
चोट जिगर पे
लगाकर तो देखो 'प्रेम'
आंसुओं का बहता दरिया है चाहत
प्रमोद कुमार सैनी(प्रेम)
ठेस
चाहत की दुनिया बसाने वालो ने
यूं चाहत को बदनाम किया
उल्फ़त की वादियों में
यूं हमने खुद को बर्बाद किया
ख्वाहिशों के समंदर में
गम का एक बेनाम साज किया
हसरतों की अर्थी जली
खामोशी का आगाज़ किया
फुरकत इक तमन्ना थी बाकी
गमखारो ने बेगाना सा इकरार किया
जला बैठे है दामन अपना आज
चिंगारियों ने यह इजहार किया
अब जाने कँहा वो चमन होगा
जिसमें खुलकर तुमने हमने प्यार किया
मिटाकर भी मिट ना सकेंगे
फिर क्यों रूखा रूखा सा रुख आज किया
ज़िन्दगी यूं ही जिये जा रहे है लोग
हमने तो बस प्यार किया, प्यार किया
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)



बहुत ही बेहतरीन तरीके से बयां करती आपकी रचनाएं 👌👌✍️✍️
ReplyDeleteआभार
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