धरा की पुकार
नमस्कार दोस्तों!!!
मेरे इस ब्लॉग धरा की पुकार में
मेरी ये रचनायें है उन सभी भारतवासियों को समर्पित है जो देश छोड़कर परदेश में रह रहे है। अपने वतन को छोड़कर दूसरे मुल्क में काम करना इतना आसान नही होता है। ऐसा होता है कि अपना शरीर कंही है और आत्मा कंही ओर है। पर इसका मतलब ये नही है कि परदेश में रहने से अपने देश के प्रति प्यार और सम्मान में कमी आ जाती है। हर भारतवासी जंहा भी रहे वह अपने वतन को कभी नहीं भूलता है। उन सभी की ह्दय व्यथा को मैंने अपनी काव्य रचनाओं से व्यस्त किया है।
हे वीर भूमि के लाल तेरी धरा तुझको है पुकारती
हे वीर भूमि के लाल तेरी धरा तुझको है पुकारती,
तेरे आने की बाट जोये आज तक माँ भारती।
माना कि प्रदेश में तुमने की बहुत कमाई है
पर तेरे सिवा कौन जाने,
इसके बदले में तुमने क्या कीमत चुकाई है।
हे वीर भूमि के लाल तेरी धरा तुझको है पुकारती,
तेरे आने की बाट जोये आज तक माँ भारती।
आसां नहीं है सात समुंदर पार जाना
गैरो के बीच अपनी बस्ती बसाना।
हे वीर भूमि के लाल तेरी धरा तुझको है पुकारती,
तेरे आने की बाट जोये आज तक माँ भारती।
जिंदगी का कोई भँवर तुझको रोक न पाया,
तेरे आगे झुक गयी कायनात सारी;
तूने खुद अपना लोहा मनवाया।
हे वीर भूमि के लाल तेरी धरा तुझको है पुकारती,
तेरे आने की बाट जोये आज तक माँ भारती।
वतन की मिट्टी की सोणी गन्ध अब भी तुम्हे भाती है
हर भारत माँ का जाया अब तेरा साथी है।
हे वीर भूमि के लाल तेरी धरा तुझको है पुकारती,
तेरे आने की बाट जोये आज तक माँ भारती।
न भुला पाया है तू अपने रोम रोम में समाये संस्कार
याद आते है तुम्हें अपनों संग मनाये सारे व्रत, त्योहार।
हे वीर भूमि के लाल तेरी धरा तुझको है पुकारती,
तेरे आने की बाट जोये आज तक माँ भारती।
तेरा खून भी है खोलता,
देश के खिलाफ जब कोई कुछ है बोलता।
हे वीर भूमि के लाल तेरी धरा तुझको है पुकारती,
तेरे आने की बाट जोये आज तक माँ भारती।
जब जब देश पर विपदा आयेगी,
निराशा और हताशा तुम्हें भी सतायेगी।
हे वीर भूमि के लाल तेरी धरा तुझको है पुकारती,
तेरे आने की बाट जोये आज तक माँ भारती।
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)
देश की मिट्टी तुम्हें बुलाती है
ओ परदेश में रहने वाले!
रह रहकर तेरी याद सताती है।
देश की मिट्टी तुम्हें बुलाती है।।
राह तके तेरी सब नदी नाले
आजा लौटकर!
हटा दे रिश्तों पर पड़े सब जाले।
ओ परदेश में रहने वाले!
रह रहकर तेरी याद सताती है।
देश की मिट्टी तुम्हें बुलाती है।।
गाँव की हर गली में
तेरी निशानी बाकी।
राह तके तेरी
अब भी बूढ़ी काकी।।
ओ परदेश में रहने वाले!
रह रहकर तेरी याद सताती है।
देश की मिट्टी तुम्हें बुलाती है।।
तेरे बिन तीज पर कौन झूले झूलाये
हर पनघट तुझको आवाज लगाये।
ओ परदेश में रहने वाले!
रह रहकर तेरी याद सताती है।
देश की मिट्टी तुम्हें बुलाती है।।
तेरे बिन सुनी वैशाखी पर भंगड़ा की टोली
हर रंग फीका पड़ा है कैसे मनाये होली।
ओ परदेश में रहने वाले!
रह रहकर तेरी याद सताती है।
देश की मिट्टी तुम्हें बुलाती है।।
तेरे बिन पोंगल की खीर खांड अधूरी
याद तो तुम्हें भी आते होंगे
माँ के हाथ के बने हलवा-पूरी।
ओ परदेश में रहने वाले!
रह रहकर तेरी याद सताती है।
देश की मिट्टी तुम्हें बुलाती है।।
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)
पाठकों मेरी रचनाओं को इतना प्यार और स्नेह देने के लिये, धन्यवाद । इसी प्रकार की अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप हमसे जुड़े रहिये।
धन्यवाद।।



Guru dev sandar
ReplyDeleteआभार
DeleteNice poem bhaiya
ReplyDeleteThank you
Deleteकलम का कोई सानी नही होता
ReplyDeleteव्यथा गैर के देख हर कोई दुखी नही होता...
आभार
Deleteबहुत ही शानदार गुरु जी
ReplyDeleteधन्यवाद जी
Delete