महंगाई की मार

Pramod Kumar Saini
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महंगाई की मार

Mahangai-Ki-Mar

महंगाई की मार

1.
हर तरफ महंगाई की मार
कमाई एक रुपया, खर्चे हजार
थक गया हूँ मैं ले लेकर उधार
आम आदमी मर रहा है भूख से
फिर भी सोई पड़ी है सरकार
बांहे फैलाये खड़ा है भृष्टाचार
कब रुकेंगे गरीब पर अत्याचार
निर्धन आस लगाये बैठा रोटी की
अमीर खरीदे बंगला, मोटर-कार
लक्ष्मी भी भरे अमीरों के ही भंडार

प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)



Dhanya-Hai-Veero-Ki-Ma


धन्य है वीरो की माँ

2.
वतन पर कुर्बान कर गये 
जो अपने जिस्म और जां,
धन्य है उन वीरो की माँ।
मिटती नहीं उनकी हस्ती
जो लड़ गये वतन की खातिर
समझकर अपनी जान बहुत सस्ती।
तुम बस मनाते रहो वेलेंटाइन डे
7 दिन की है ये मस्ती,
तुम्हारे लिये जिन्होंने डूबा ली अपनी कश्ती।
तुम गुलाब और चॉकलेट के चक्कर मे खूब करो मटरगश्ती,
वो ही नादां थे, तुम्हारे चक्कर में छोड़ गये जो अपनी बस्ती।

पुलवामा शहीदों को नमन।

प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

रोक लू बहार को

3.
न जाने क्यों अब भी आँखे तरसती है,
तेरे इक दीदार को।
गर तेरे आने की आस हो,
तो मैं रोक लू बहार को।

प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)

Itna-Bhi-Chhota-Na-Ishk-Mera

इतना भी छोटा न इश्क़ मेरा

4.
इतना भी छोटा न इश्क़ मेरा,
सात दिन का ये मोहताज नहीं।
चंद दिनों के है ये चोंचले,
इन में ज़िन्दगी भर का साथ नहीं।

प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)


पाठकों मैं आशा करता हूं कि आपको मेरी रचनाएं महंगाई की मारधन्य है वीरो की माँरोक लू बहार को और
इतना भी छोटा न इश्क़ मेरा पसंद आई होगी। इसी प्रकार की अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप हमसे जुड़े रहिये।
धन्यवाद।।


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4Comments

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  1. बहुत अच्छा।

    एक नई तरह की इबारत हैं आपके जज्बातों के इस भंवर में।
    फिर भी आप निकाल ही लाए कश्ती मजधार से।।

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  2. Waqt ki Qadar Na Jaane Kyon bhul gaye hain log is Kavi ko meri taraf se kavita ka mubarak ho

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