Jivan Kram Ka Khel
जीवन-क्रम
नमस्कार दोस्तों ! मेरे इस ब्लॉग Jivan Kram Ka Khel (जीवन क्रम) में मैं आपके सामने लेकर आया हूँ मेरी आज तक कि सबसे ज्यादा स्नेह पायी हुई कविता जीवन क्रम । इस कविता ने मुझे देश था विदेश में बहुत लोगों की आंखों का तारा बना दिया। इस कविता ने मुझे काव्य क्षेत्र में स्थापित करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की। यह रचना मेरी आज तक की सबसे ज्यादा आर्थिक लाभ और स्नेह प्राप्त कविता है। इस कविता ने मुझे दिल्ली प्रेस प्रकाशन में जगह दिलवाई। जिसकी पुस्तके- सरिता, नन्दन, सरस-सलिल आदि को आप पढ़ते रहते है। यह रचना सरिता पुस्तक में छपी और देश के कोने कोने तक पहुंची।कविता पढ़ने से पहले इसे पढ़े ताकि कविता के भावों को आसानी से समझा जा सके-
कविता के बारे में
इस कविता में एक साथ दो तत्व चल रहे है-
1. जीवन
2. दिन
पहला छंद एवं दूसरा छंद
जब सुबह होती है तो यही नजारा होता है उसी प्रकार एक बच्चे के जन्म पर भी यही नजारा होता है। उससे परिवार की कई आशाएं जुड़ी होती है।
तीसरा छंद
यह छंद जिंदगी के उतार और चढ़ाव दोनों को लिये हुये है।
चढ़ाव
दोपहर में सूरज पूरी दुनिया पर अपनी हुकूमत जमाता हुआ प्रतीत होता है। उसे लगता ही नहीं कि आगे रात्रि भी होगी। इसी प्रकार इंसान के जीवन मे भी एक ऐसा वक्त आता है जब वह अपने चरम पर होता है। वह जिंदगी में आगे आने वाले दुखों के बारे में नही सोचता है। लोग सब उससे नजदिकी बनाने की कोशिश करते है। पर उसे लगता है मुझे किसी की जरूरत नहीं है।
उतार
लेकिन दोपहर के बाद सूरज ढलने लगता है। उसी प्रकार एक चरम के बाद इंसान भी पतन की ओर होता है। जो भी उसके अपने होते है दूर होते जाते है। अब वह उनसे नजदीकी बनाने की कोशिश करता है।
चौथा छंद
यह शाम के दृश्य को बताता है। जीवन मे व्यक्ति की दुखों की स्थिति को बताता है। इस स्थिति में इंसान अपने सभी मित्रों और रिश्तेदारों से मदद की उम्मीद करता है। लेकिन उसे कंही से भी मदद नही मिलती है। फिर इंसान अपने दुखों से स्वयं ही खड़ा हो जाता है। वह खुद ही लड़ना सिख जाता है। उसे पता चल जाता है कि उसे अपने जीवन की लड़ाई स्वयं लड़नी है।
पाँचवा छंद
यह संध्या के दृश्य को बताता है। जीवन मे यह बुढ़ापे का संकेत है। शाम को ही व्यक्ति अपने पूरे दिन भर के क्रियाकलापों के बारे में सोचता है। इसी प्रकार इंसान भी बुढ़ापे में सोचता है मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन मे क्या किया।
Jivan Kram Ka Khel
जीवन-क्रम
(1)पक्षी चहचहा रहे हैं,नभ पे है लालिमा छाई।गम के बादल छठे हैं,खुशी की किरण आई।। (2)फिर अरमानों ने बस्ती बसाई,उम्मीदों के मेले लग रहे हैं।हसरतों के फूल खिल रहे हैं,जनत से ताजा हवा आई।। (3)बढ़ा है रवि जग पे छाने,चाँद निशा के आँचल में आया।निकला है 'प्रेम' प्यार पाने,चाहतों ने दामन छिटकाया।। (4)दर्द का मोती आँचल में आया,दुख का दरिया पाने।दिल का जख्म दिखाने,आह को फिर आगाज बनाया।। (5)थके विहंग आये डालों पर,मन का मौजी भरमाया।कश्ती अब पहुँची साहिल पर,नाविक ने डेरा लगाया। (6)लगा सोचने, क्या कमाया?इन समंदर की लहरों पर।जीवन के आठों पहरों पर,कभी रोया, कभी गुनगुनाया।। प्रमोद कुमार सैनी(प्रेम) कठिन शब्दार्थ
(1)
पक्षी चहचहा रहे हैं,
नभ पे है लालिमा छाई।
गम के बादल छठे हैं,
खुशी की किरण आई।।
(2)
फिर अरमानों ने बस्ती बसाई,
उम्मीदों के मेले लग रहे हैं।
हसरतों के फूल खिल रहे हैं,
जनत से ताजा हवा आई।।
(3)
बढ़ा है रवि जग पे छाने,
चाँद निशा के आँचल में आया।
निकला है 'प्रेम' प्यार पाने,
चाहतों ने दामन छिटकाया।।
(4)
दर्द का मोती आँचल में आया,
दुख का दरिया पाने।
दिल का जख्म दिखाने,
आह को फिर आगाज बनाया।।
(5)
थके विहंग आये डालों पर,
मन का मौजी भरमाया।
कश्ती अब पहुँची साहिल पर,
नाविक ने डेरा लगाया।
(6)
लगा सोचने, क्या कमाया?
इन समंदर की लहरों पर।
जीवन के आठों पहरों पर,
कभी रोया, कभी गुनगुनाया।।
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)
कठिन शब्दार्थ
नभ-आसमानजन्नत- स्वर्गरवि-सूरजनिशा-रात्रिआह-दुख/दर्द/पीड़ाआगाज- नई शुरूआतविहंग-पक्षीसाहिल-मंजिल
पाठकों आप जो प्रेम और स्नेह मेरी रचनाओं को दे रहे है उसके लिये आपका बहुत बहुत आभार। आपका ये स्नेह मुझे नये जोश से भर देता है।
मैं आशा करता हूँ कि मैं आपके विश्वाश पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा। बस आप हमसे यूँही जुड़े रहे। प्रत्येक रचना पर अपनी सकारात्मक और नकारात्मक टिप्पणी देते रहें।
धन्यवाद।।
आपका अपना
प्रमोद कुमार सैनी
(प्रेम)



Very inspiring 👌👌👍👍👍👍
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteBahut achi baat h bhaiji
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